कुलदेवी वरोठ माता मंदिर निर्माण का संकल्प

रतलाम (मालवा) के पितलिया परिवार विगत 50 वर्षो से सतीमाता के दरबार से निरंतर जुड़े रहे .पितलिया रतनलाल पगड़ी वाले और रतनलाल टोपीवाले तथा इनके अन्य बंधू गण जवालिया सतीमाता से कुलदेवी वारोठमाता का मन्दिर बनवाने की अनुमति हेतु बारम्बार प्रार्थना करते रहे.मुग़ल सम्राट अकबर के काल में माताजी की बहुमूल्य भव्य प्रतिमा इस मंदिर में विद्यमान थी. किन्तु मुगलिया बदनीयती के कारण मंदिर के उत्तरी द्वार से अदृश्य होकर माता मंदिर के निकट के माया कुंड में समाविष्ट हो गई. प्रतिमा रहित भव्य मंदिर भग्नावस्था में आज भी विध्मान है.

मंदिर में माँ की प्रतिमा न होने से पितलिया परिवार दुखी होकर नविन मंदिर बनाने हेतु सतीमाता से प्रार्थना करते रहे .

हज़ारो पितलिया परिवार की उपस्थिति में ज्वालिया सतीमाता ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा की मालवा की पावन नगरी रतलाम में मंदिर की रचना का समय आ गया है.

जवालिया सतीमाता की आज्ञा का पूर्ण निष्ठां और विश्वास से पालन करने की प्रतिज्ञा लेकर समिति के सचिव रतनलाल टोपीवाले और इनके प्रिय मित्र कोषाध्यक्ष रतनलाल पगड़ीवाले द्वय कभी अकेले तो कभी अपनी सहयोगियों के साथ देश के कोने कोने में बसे पितलिया परिवार को सतीमाता के आदेश से अवगत कराते रहे .
ज्वालिया सतीमाता के आदेश से रतलाम-मालवा में एक छोटे से मंदिर की रचना कर उसमे वरोठ माता की प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिए मंदिर निर्माण का कार्य प्रारम्भ करना चाहा. किन्तु वरोठ माता की असीम कृपा का प्रतिफल मिलने से परिणाम यहाँ हुवा की बगैर किसी विशेषज्ञ और मानचित्र के सहयोग से माताजी का भव्य शिखर मंदिर अपने वर्त्तमान रूप में आकर्षण का केंद्र बन गया है .
रतलाम के पश्चिमी शोर पर जैन और वैषणव सम्पदाय के तीर्थ स्थलों की पावन भूमि पर हमारी आस्था और विश्वास की कुलदेवी वरोठ माताजी का पवित्र मंदिर एक ऐसा स्थल बन गया है जहा आकर हम अपनी सतीमाता के निर्देशानुसार सभी क्रियाकलापो का सरलता से पालन कर सकते है.

मंदिर निर्माण का महा इतिहास रच दिया है, इसके सुनहरी पुष्टो में अभिवृद्धि करने हेतु अब आपकी बारी है. ऐसी nअवधारणा लिए समिति समस्त पितलिया बंधुओ से सानुरोध निवेदन करती है की ज्वालिया सतीमाता के आदेश से निर्मित अपनी कुलदेवी वरोठ माताजी के अपने मंदिर में पधार कर अपने समस्त धार्मिक अनुष्ठानो , मान और मन्नतो की रसम जैसी आयोजनों को पूर्ण निष्ठां के साथ यहाँ पधारकर सम्पन्न करे. अपने मंदिर को प्रभावी तीर्थ स्थल में परिवर्तित करने के स्वप्न को साकार करने की दिशा में निर्माणाधीन कार्य को पूर्ण करने में अपनी अहम् भूमिका निभाए .



महा नवकार मंत्र

"णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं

एसो पंचणमोक्कारो, सव्व-पावप्पणासणो |
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमंहवई मंगलम्||